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21+ Poems On Nature In Hindi | प्रकृति पर कविता

इस पोस्ट में हम आपके साथ Poems On Nature In Hindi शेयर करने जा रहे है यह कविताये स्कूल में सुनाने, किसी समारोह में सुनाने एवं अन्य में आपके लिए सहायक होगी एवं आपको इनसे सिखने को भी मिलेगा।

प्रकृति पर कविता आपने स्कूल में कभी न कभी जरूर पढ़ा होगा एवं जानते भी होंगे प्रकृति हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है यह जीवन है इसकी हमे रक्षा करनी चाहिए क्युकी प्रकृति हमे बिना किसी शुल्क के  शुद्ध हवा, पानी, भोजन और बहुत सारे संसाधन उपलब्ध करती है ,

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जिससे हमारा जीवन आसान हो जाता है एवं चलता है। अभी के समय में लोगो को इसका महत्त्व नहीं पता है वो इसके साथ खिलवाड़ कर रहे है, कूड़ा करकट इसपर दाल रहे है एवं पेड़ पौधे काट दे रहे है अगर ऐसा ही होता रहा तो सबका जीवन संकट में आ सकता है। 

हमे प्रकृति का ध्यान रखना चाहिए एवं इसके साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। 

Poem On Nature In Hindi

Hindi Poem On Nature

प्रकृति काफी सुन्दर है एवं इसे हमेशा सुन्दर ही रखना चाहिए इसलिए प्रकृति पर हमारे कवियों ने इसपर काफी अच्छी – अच्छी कविताये लिखी है जो की काफी अच्छा है आपको इसे जरूर पढ़ना चाहिए एवं आप इसका उपयोग कहि पर सुनाने के लिए भी कर सकते है तो चलिए जानते है – 

ये सभी कविताये हमने इंटरनेट पर से एवं सोशल साइट से कलेक्ट की है ये हमारे द्वारा लिखी गयी नहीं है इन कविताओं को कवियों के द्वारा लिखा गया है इसलिए मै आभारी हु उन सभी कवियों के लिए जिन्होंने बेहतरीन कविताओं को लिखा है।

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Short Poems On Nature In Hindi

लाली है, हरियाली है

लाली है, हरियाली है,

रूप बहारो वाली यह प्रकृति,

मुझको जग से प्यारी है।

हरे-भरे वन उपवन,

बहती झील, नदिया,

मन को करती है मन मोहित।

प्रकृति फल, फूल, जल, हवा,

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सब कुछ न्योछावर करती,

ऐसे जैसे मां हो हमारी।

हर पल रंग बदल कर मन बहलाती,

ठंडी पवन चला कर हमे सुलाती,

बेचैन होती है तो उग्र हो जाती।

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कहीं सूखा ले आती, तो कहीं बाढ़,

कभी सुनामी, तो कभी भूकंप ले आती,

इस तरह अपनी नाराजगी जताती।

सहेज लो इस प्रकृति को कहीं गुम ना हो जाए,

हरी-भरी छटा, ठंडी हवा और अमृत सा जल,

कर लो अब थोड़ा सा मन प्रकृति को बचाने का।

~ नरेंद्र वर्मा

प्रकृति संदेश

पर्वत कहता शीश उठाकर,

तुम भी ऊँचे बन जाओ।

सागर कहता है लहराकर,

मन में गहराई लाओ।

समझ रहे हो क्या कहती हैं

उठ उठ गिर गिर तरल तरंग

भर लो भर लो अपने दिल में

मीठी मीठी मृदुल उमंग!

पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो

कितना ही हो सिर पर भार,

नभ कहता है फैलो इतना

ढक लो तुम सारा संसार!

~ सोहनलाल द्विवेदी

प्रकृति धरा पर कुछ भी 

प्रकृति। धरा पर कुछ भी अपने लिए नहीं करती,

नदियाँ पहाड़ों से अपने लिए नहीं उतरती

चाँद सूरज भी कहाँ अपने लिए चमकते हैं?

प्यार भरे दिल भी दूसरों के लिए धड़कते हैं

फूल- वृक्ष की डाली अपने लिए नहीं फलती,

प्रकृति धरा पर कुछ भी अपने लिए नही करती

मनुज तू ही क्यूं फिर अपने में लगा रहता हैं?

इस धरा की धारा में तू क्यूं नहीं बहता हैं?

यह इक बात है मेरे गले से नहीं उतरती,

प्रकृति तू हमको भी क्यूं अपना -सा नही करती?

प्रकृति धरा पर कुछ भी अपने लिए नहीं करती,

नदियाँ पहाड़ों से अपने लिए नहीं उतरती|

बहे पवन फिर महके उपवन सभी के वास्ते

चले गगन फिर बरसे जल -धन सभी के वास्ते

दिखाती राह सच्चाई बने खुशी की परछाई,

करे प्रकाश लौ दीपक की सभी के वास्ते

रोशन आग काले अँधेरों के लिए होती ,

चमक सितारों की भी अपनी लिए नहीं होती।

रात तेरे बाद सुबह होने से नहीं मुकरती,

प्रकृति धरा पर कुछ भी अपने लिए नहीं करती।

~ धीरज शर्मा

प्रकृति बिना मनुष्य कविता

नदी तब भी थी

जब कोई उसे नदी कहने वाला न था

पहाड़ तब भी थे

हिमालय भले ही इतना ऊॅचा न रहा हो

ना रहे हों समुद्र में इतने जीव

नदी पहाड हिमालय समुद्र

तब भी रहंेगे

जब नहीं रहेंगे इन्हें पुकारने वाले

इन पर गीत लिखने वाले

इनसे रोटी उगाने वाले

नदी पहाड़ हिमालय समुद्र

मनुष्य के बिना भी

नदी पहाड़ हिमालय समुद्र हैं

इनके बिना मनुष्य, मनुष्य नहीं।

~ रेखा चमोली

 प्रकृति से प्रेम करें

 प्रकृति से प्रेम करें

आओ आओ प्रकृति से प्रेम करें,

भूमि मेरी माता है,

और पृथ्वी का मैं पुत्र हूं।

मैदान, झीलें, नदियां, पहाड़, समुंद्र,

सब मेरे भाई-बहन है,

इनकी रक्षा ही मेरा पहला धर्म है।

अब होगी अति तो हम ना सहन करेंगे,

खनन-हनन व पॉलीथिन को अब दूर करेंगे,

प्रकृति का अब हम ख्याल रखेंगे।

हम सबका जीवन है सीमित,

आओ सब मिलकर जीवन में उमंग भरे,

आओ आओ प्रकृति से प्रेम करें।

प्रकृति से हम है प्रकृति हमसे नहीं,

सब कुछ इसमें ही बसता,

इसके बिना सब कुछ मिट जाता।

आओ आओ प्रकृति से प्रेम करें।

~ नरेंद्र वर्मा

बसंत मनमाना

चादर-सी ओढ़ कर ये छायाएँ

तुम कहाँ चले यात्री, पथ तो है बाएँ।

धूल पड़ गई है पत्तों पर डालो लटकी किरणें

छोटे-छोटे पौधों को चर रहे बाग में हिरणें,

दोनों हाथ बुढ़ापे के थर-थर काँपे सब ओर

किन्तु आँसुओं का होता है कितना पागल ज़ोर-

बढ़ आते हैं, चढ़ आते हैं, गड़े हुए हों जैसे

उनसे बातें कर पाता हूँ कि मैं कुछ जैसे-तैसे।

पर्वत की घाटी के पीछे लुका-छिपी का खेल

खेल रही है वायु शीश पर सारी दनिया झेल।

छोटे-छोटे खरगोशों से उठा-उठा सिर बादल

किसको पल-पल झांक रहे हैं आसमान के पागल?

ये कि पवन पर, पवन कि इन पर, फेंक नज़र की डोरी

खींच रहे हैं किसका मन ये दोनों चोरी-चोरी?

फैल गया है पर्वत-शिखरों तक बसन्त मनमाना,

पत्ती, कली, फूल, डालों में दीख रहा मस्ताना।

~ माखनलाल चतुर्वेदी

प्रकृति और हम

जब भी घायल होता है मन

प्रकृति रखती उस पर मलहम

पर उसे हम भूल जाते हैं

ध्यान कहाँ रख पाते हैं

उसकी नदियाँ, उसके सागर

उसके जंगल और पहाड़

सब हितसाधन करते हमारा

पर उसे दें हम उजाड़

योजना कभी बनाएँ भयानक

कभी सोच लें ऐसे काम

नष्ट करें कुदरत की रौनक

हम, जो उसकी ही सन्तान

~ अनातोली परंपरा

हरे पेड़ पर चली कुल्हाड़ी

हरे पेड़ पर चली कुल्हाड़ी धूप रही ना याद।

मूल्य समय का जाना हमने खो देने के बाद।।

खूब फसल खेतों से ले ली डाल डाल कर खाद।

पैसों के लालच में कर दी उर्वरता बर्बाद।।

दूर दूर तक बसी बस्तियाँ नगर हुए आबाद।

बन्द हुआ अब तो जंगल से मानव का संवाद।।

ताल तलैया सब सूखे हैं हुई नदी में गाद।

पानी के कारण होते हैं हर दिन नए विवाद।।

पशु पक्षी बेघर फिरते हैं कौन सुने फरियाद।

कुदरत के दोहन ने सबके मन में भरा विषाद।।

~ सुरेश चन्द्र

वन, नदियां, पर्वत व सागर

वन, नदियां, पर्वत व सागर,

अंग और गरिमा धरती की,

इनको हो नुकसान तो समझो,

क्षति हो रही है धरती की।

हमसे पहले जीव जंतु सब,

आए पेड़ ही धरती पर,

सुंदरता संग हवा साथ में,

लाए पेड़ ही धरती पर।

पेड़ -प्रजाति, वन-वनस्पति,

अभयारण्य धरती पर,

यह धरती के आभूषण है,

रहे हमेशा धरती पर।

बिना पेड़ पौधों के समझो,

बढ़े रुग्णता धरती की,

हरी भरी धरती हो सारी,

सेहत सुधरे धरती की।

खनन, हनन व पॉलीथिन से,

मुक्त बनाएं धरती को,

जैव विविधता के संरक्षण की,

अलख जगाए धरती पर।

~ रामगोपाल राही

कहो, तुम रूपसि कौन

कहो, तुम रूपसि कौन?

व्योम से उतर रही चुपचाप

छिपी निज छाया-छबि में आप,

सुनहला फैला केश-कलाप,

मधुर, मंथर, मृदु, मौन!

मूँद अधरों में मधुपालाप,

पलक में निमिष, पदों में चाप,

भाव-संकुल, बंकिम, भ्रू-चाप,

मौन, केवल तुम मौन!

ग्रीव तिर्यक, चम्पक-द्युति गात,

नयन मुकुलित, नत मुख-जलजात,

देह छबि-छाया में दिन-रात,

कहाँ रहती तुम कौन?

अनिल पुलकित स्वर्णांचल लोल,

मधुर नूपुर-ध्वनि खग-कुल-रोल,

सीप-से जलदों के पर खोल,

उड़ रही नभ में मौन!

लाज से अरुण-अरुण सुकपोल,

मदिर अधरों की सुरा अमोल,–

बने पावस-घन स्वर्ण-हिंदोल,

कहो, एकाकिनि, कौन?

मधुर, मंथर तुम मौन?

~ सुमित्रानंदन पंत

Poems On Nature In Hindi – Prakriti Par Kavita

संभल जाओ ऐ दुनिया वालो

संभल जाओ ऐ दुनिया वालो

वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही !

रब करता आगाह हर पल

प्रकृति पर करो घोर अत्यचार नही !!

लगा बारूद पहाड़, पर्वत उड़ाए

स्थल रमणीय सघन रहा नही !

खोद रहा खुद इंसान कब्र अपनी

जैसे जीवन की अब परवाह नही !!

लुप्त हुए अब झील और झरने

वन्यजीवो को मिला मुकाम नही !

मिटा रहा खुद जीवन के अवयव

धरा पर बचा जीव का आधार नहीं !!

नष्ट किये हमने हरे भरे वृक्ष,लताये

दिखे कही हरयाली का अब नाम नही !

लहलाते थे कभी वृक्ष हर आँगन में

बचा शेष उन गलियारों का श्रृंगार नही !

कहा गए हंस और कोयल, गोरैया

गौ माता का घरो में स्थान रहा नही !

जहाँ बहती थी कभी दूध की नदिया

कुंए,नलकूपों में जल का नाम नही !!

तबाह हो रहा सब कुछ निश् दिन

आनंद के आलावा कुछ याद नही

नित नए साधन की खोज में

पर्यावरण का किसी को रहा ध्यान नही !!

विलासिता से शिथिलता खरीदी

करता ईश पर कोई विश्वास नही !

भूल गए पाठ सब रामयण गीता के,

कुरान,बाइबिल किसी को याद नही !!

त्याग रहे नित संस्कार अपने

बुजुर्गो को मिलता सम्मान नही !

देवो की इस पावन धरती पर

बचा धर्म -कर्म का अब नाम नही !!

संभल जाओ ऐ दुनिया वालो

वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही !

रब करता आगाह हर पल

प्रकृति पर करो घोर अत्यचार नही !!

~ डी. के. निवातियाँ

ये वृक्षों में उगे परिन्दे

ये वृक्षों में उगे परिन्दे

पंखुड़ि-पंखुड़ि पंख लिये

अग जग में अपनी सुगन्धित का

दूर-पास विस्तार किये।

झाँक रहे हैं नभ में किसको

फिर अनगिनती पाँखों से

जो न झाँक पाया संसृति-पथ

कोटि-कोटि निज आँखों से।

श्याम धरा, हरि पीली डाली

हरी मूठ कस डाली

कली-कली बेचैन हो गई

झाँक उठी क्या लाली!

आकर्षण को छोड़ उठे ये

नभ के हरे प्रवासी

सूर्य-किरण सहलाने दौड़ी

हवा हो गई दासी।

बाँध दिये ये मुकुट कली मिस

कहा-धन्य हो यात्री!

धन्य डाल नत गात्री।

पर होनी सुनती थी चुप-चुप

विधि -विधान का लेखा!

उसका ही था फूल

हरी थी, उसी भूमि की रेखा।

धूल-धूल हो गया फूल

गिर गये इरादे भू पर

युद्ध समाप्त, प्रकृति के ये

गिर आये प्यादे भू पर।

हो कल्याण गगन पर-

मन पर हो, मधुवाही गन्ध

हरी-हरी ऊँचे उठने की

बढ़ती रहे सुगन्ध!

पर ज़मीन पर पैर रहेंगे

प्राप्ति रहेगी भू पर

ऊपर होगी कीर्ति-कलापिनि

मूर्त्ति रहेगी भू पर।।

~ माखनलाल चतुर्वेदी

प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है

प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है,

मार्ग वह हमें दिखाती है।

प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

नदी कहती है’ बहो, बहो

जहाँ हो, पड़े न वहाँ रहो।

जहाँ गंतव्य, वहाँ जाओ,

पूर्णता जीवन की पाओ।

विश्व गति ही तो जीवन है,

अगति तो मृत्यु कहाती है।

प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

शैल कहतें है, शिखर बनो,

उठो ऊँचे, तुम खूब तनो।

ठोस आधार तुम्हारा हो,

विशिष्टिकरण सहारा हो।

रहो तुम सदा उर्ध्वगामी,

उर्ध्वता पूर्ण बनाती है।

प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

वृक्ष कहते हैं खूब फलो,

दान के पथ पर सदा चलो।

सभी को दो शीतल छाया,

पुण्य है सदा काम आया।

विनय से सिद्धि सुशोभित है,

अकड़ किसकी टिक पाती है।

प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

यही कहते रवि शशि चमको,

प्राप्त कर उज्ज्वलता दमको।

अंधेरे से संग्राम करो,

न खाली बैठो, काम करो।

काम जो अच्छे कर जाते,

याद उनकी रह जाती है।

प्रकृति कुछ पाठ पढ़ाती है।

~ श्रीकृष्ण सरल

प्रकृति रमणीक है

प्रकृति रमणीक है।

जिसने इतना ही कहा-

उसने संकुल सौंदर्य के घनीभूत भार को

आत्मा के कंधों पर

पूरा नहीं सहा!

भीतर तक

क्षण भर भी छुआ यदि होता-

सौंदर्य की शिखाओं ने,

जल जाता शब्द-शब्द,

रहता बस अर्थकुल मौन शेष।

ऐसा मौन-जिसकी शिराओं में,

सारा आवेग-सिंधु,

पारे-सा-

इधर-उधर फिरता बहा-बहा!

प्रकृति ममतालु है!

दूधभरी वत्सलता से भीगी-

छाया का आँचल पसारती,

-ममता है!

स्निग्ध रश्मि-राखी के बंधन से बांधती,

-निर्मल सहोदरा है!

बाँहों की वल्लरि से तन-तरू को

रोम-रोम कसती-सी!

औरों की आँखों से बचा-बचा-

दे जाती स्पर्शों के अनगूंथे फूलों की पंक्तियाँ-

-प्रकृति प्रणयिनी है!

बूंद-बूंद रिसते इस जीवन को, बांध मृत्यु -अंजलि में

भय के वनांतर में उदासीन-

शांत देव-प्रतिमा है!

मेरे सम्मोहित विमुग्ध जलज-अंतस्‌ पर खिंची हुई

प्रकृति एक विद्युत की लीक है!

ठहरों कुछ, पहले अपने को, उससे सुलझा लूँ

तब कहूँ- प्रकृति रमणीक है…

~ जगदीश गुप्त

प्रकृति-परी

प्रकृति परी

हाथ लिये घूमती

जादू की छड़ी

मोहक रूप धरे

सब का मन हरे

धरा सुन्दरी!

तेरा मोहक रूप

बड़ा निराला

निज धुन मगन

हर कोई मतवाला

वसन्त आया

बहुत ही बातूनी

हुई हैं मैना

चहकती फिरतीं

अरी, आ, री बहना

आम की डाली

खुशबू बिखेरती

पास बुलाती

‘चिरवौनी’ करती है

पिकी, चोंच मार के

चाँदनी स्नात

शरद-पूनो रात

भोर के धोखे

पंछी चहचहाते

जाग पड़ता वन

मायके आती

गंध मदमाती-सी

कली बेला की

वर्ष में एक बार

यही रीति-त्योहार

शेफाली खिली

वन महक गया

ॠतु ने कहा:

गर्व मत करना

पर्व यह भी गया

काम न आई

कोहरे की रज़ाई

ठण्डक खाई

छींक-छींक रजनी

आँसू टपका रही

दुग्ध-धवल

चाँदनी में नहाया

शुभ्र, मंगल

आलोक जगमग

हँस रहा जंगल

तम घिरा रे

काजल के पर्वत

उड़ते आए

जी भर बरसेंगे

धान-बच्चे हँसेंगे

घुमन्तू मेघ

बड़े ही दिलफेंक

शम्पा को देखा

शोख़ी पे मर मिटे

कड़की, डरे, झरे

बड़ी सुबह

सूरज मास्टर दा’

किरण-छड़ी

ले, आते-धमकाते

पंछी पाठ सुनाते

सलोनी भोर

श्वेत चटाई बिछा

नीले आँगन

फुरसत में बैठी

कविता पढ़ रही

फाल्गुनी रात

बस्तर की किशोरी

सज-धज के

‘घोटुल’ को तैयार

चाँद ढूँढ लिया है

वर्षा की भोर,

मेघों की नौका-दौड़

शुरू हो गई

‘रेफरी’ थी जो हवा,

खेल शामिल हुई

वन पथ में

जंगली फूल-गंध

वनैली घास

चीना-जुही लतर

सोई राज कन्या-सी

सज के बैठी

आकाश की अटारी

बालिका-बधू

नीला आँचल उठा

झाँके मासूम घटा

वर्षा से ऊबे

शरदाकाश तले

हरी घास पे

रंग-बिरंगे पंछी

पिकनिक मनाते

आज सुबह

आकाश में अटकी

दिखाई पड़ी

फटी कागज़ी चिट्ठी

आह! टूटा चाँद था!!

ज्वर से तपे

जंगल के पैताने

आ बैठी धूप

प्यासा बेचैन रोगी

दो बूँद पानी नहीं

कोयलिया ने

गाए गीत रसीले

कोई न रीझा

धन की अंधी दौड़

कान चुरा ले भागी

जी भर जीना

गाना-चहचहाना

पंछी सिखाते:

केवल वर्तमान

कल का नहीं भान

परिन्दे गाते

कृतज्ञता से गीत

प्रभु की प्रति:

उड़ने को पाँखें दीं

और चंचु को दाना

पौष का सूर्य

सामने नहीं आता

मुँह चुराता

बेवफ़ा नायक-सा

धरती को फुसलाता

धरा के जाये

वसन्त आने पर

खिलखिलाए

फूले नहीं समाए

मस्ती में गीत गाए

बहुत छोटा

तितली का जीवन

उड़ती रहे

पराग पान करे

कोई कुछ न कहे

जंगल गाता

भींगुर लेता तान

झिल्ली झंकारे

टिम-टिम जुगनू

तरफओं के चौबारे

अपने भार

झुका है हरसिंगार

फूलों का बोझ

उठाए नहीं बने

खिले इतने घने

सूरज मुखी

सूर्य दिशा में घूमें

पूरे दिवस

प्रमाण करते-से

भक्ति भाव में झूमें

पावस ॠतु:

प्रिया को टेर रहा

हर्षित मोर

पंख पैफला नाचता

प्रेम-कथा बाँचता

पेड़ हैरान

पूछें- हे भगवान्!

इंसानी त्मिप्सा

हम क्या करेंगे जी?

कट-कट मरेंगे जी?

हुई जो भोर

टुहँक पड़े मोर

देखा नशारा

नीली बन्दनवार

अक्षितिज सजी थी

छींेंटे, बौछार

भिगो, खिलखिलाता

शोख़ झरना

स्पफटिक की चादर

किसने जड़े मोती?

पाँत में खड़े

गुलमोहर सजे

हरी पोशाक

चोटी में गूँथे पूफल

छात्राएँ चलीं स्कूल

ठण्डी बयार

सलोनी-सी सुबह

मीठी ख़ुमारी

कोकिल कूक उठी

अजब जादूगरी

बढ़ता जाये

ध्रती का बुख़ार

आर न पार

उन्मत्त है मानव

स्वयंघाती दानव

दिवा अमल

सरि में हलचल

पाल ध्वल

खुले जो तट बँध्

नौका चली उछल

पेंफकता आग

भर-भर के मुट्ठी

धरा झुलसी

दिलजला सूरज

जला के मानेगा

रात के साथी

सब विदा हो चुके

पैफली उजास

अटका रह गया

पफीके ध्ब्बे-सा चाँद

आया आश्विन

मतवाला बनाए

हवा खुनकी

मनचीता पाने को

चाह पिफर ठुनकी

सृष्टि सुन्दरी

पिफर पिफर रिझाती

मत्त यौवना

टूट जाता संयम

अनादि पुरूष का

मैल, कीचड़

सड़े पत्तों की गंध्

लपेटे तन

बंदर-सी खुजाती

आ खड़ी बरसात

सिर पे ताज

पीठ पर है दाग्­ा

गीतों की रानी

गाती मीठा तरानाµ

वसन्त! पिफर आना

प्रिय न आए

बैठी दीप जलाए

आकाश तले

आँसू गिराती निशा

न रो, उषा ने कहा

गुलाबी, नीले

बैंगनी व ध्वल

रंग-निर्झर

सावनी की झाड़ियाँ

हँस रहीं जी भर

बुलबुल का

बहार से मिलन

रहा नायाब

गाती रही तराना

खिलते थे गुलाब

किसकी याद

सिर पटकती है

लाचार हवा

खोज-खोज के हारी

नहीं दर्द की दवा

आ गया पौष

लाया ठण्डी सौगातें

बप़्ार्फीली रातें

पछाड़ खाती हवा

कोई घर न खुला

~ सुधा गुप्ता

प्रकृति

विधाता रहस्य रचता है

मनुष्य विस्मय में डूब जाता है

फिर जैसी जिसकी आस

वैसी उसकी तलाश

नतीज़े दिखाकर

प्रकृति मुमराह नहीं करती

प्रकृति जानती है

वह बड़ी है

पर, आस्था और

विश्वास पर खड़ी है

जहाँ एक पूजा घर होने से

बहुत कुछ बच जाता है खोने से

अनन्त का आभास

निकट से होता है

एक आइना अपनी धुरी पर

धूमता हुआ

बहुत दूर निकल जाता है

तब क्या-क्या

सामने आता है

जटिलताओं का आभास

फूल-पत्तियों को कम

जड़ों और बारीक तंतुओं को ज्यादा होता है

जहाँ भाषा और जुबान का

कोई काम नहीं होता 

~ डी. एम. मिश्र

प्रकृति माँ

हे प्रकृति माँ ,

मैं तेरा ही अंश हूं,

लाख चाहकर भी,

इस सच्चाई को ,

झुठला नहीं सकता ।

मैंने लिखी है बेइन्तहा,

दास्तान जुल्मों की,

कभी अपने स्वार्थ के लिए,

काटे हैं जंगल,

तो कभी खेादी है सुंरगें,

तेरा सीना चीरकर ।

अपनी तृष्णा की चाह में,

मैंने भेंट चढ़ा दिए हैं,

विशालकाय पहाड.,

ताकि मैं सीमेंट निर्माण कर,

बना संकू एक मजबूत और,

टिकाऊ घर अपने लिए ।

अवैध खनन में भी ,

पीछे नहीं रहा हूँ ,

पानी के स्त्रोत,

विलुप्त कर,

मैंने रौंद डाला है,

कृषि भूमि के,

उपजाऊपन को भी l

चंचलता से बहते,

नदी,नालों और झरनों को,

रोक लिया है मैंने बांध बनाकर,

ताकि मैं विद्युत उत्पादन कर,

छू संकू विकास के नये आयाम l

तुम तो माता हो,

और कभी कुमाता,

नहीं हो सकती,

मगर मैं हर रोज ,

कपूत ही बनता जा रहा हूं।

अपने स्वार्थों के लिए ,

नित कर रहा हूँ ,

जुल्म तुम पर,

फिर भी तुमने कभी ,

ममता की छांव कम न की ।

दे रही हो हवा,पानी,धूप,अन्न

आज भी,

और कर रही हो,

मेरा पोषण हर रोज।

~ मनोज चौहान

प्रकृति में तुम

सूर्य की चमक में
तुम्हारा ताप है
हवाओं में
तुम्हारी साँस है
पाँखुरी की कोमलता में
तुम्हारा स्पर्श
सुगंध में
तुम्हारी पहचान।

जब जीना होता है तुम्हें
प्रकृति में खड़ी हो जाती हूँ
और आँखें
महसूस करती हैं
अपने भीतर तुम्हें।

मैं अपनी परछाईं में
देखती हूँ तुम्हें
परछाईं के काग़ज़ पर
लिखती हूँ गहरी परछाईं के
प्रणयजीवी शब्द।

तुम मेरी आँखों के भीतर
जो प्यार की पृथ्वी रचते हो
उसे मैं शब्द की प्रकृति में
घटित करती हूँ।पुष्पिता

~ पुष्पिता

प्रकृति की ओर कविता

प्रातः बेला
टटके सूरज को जी भर देखे
कितने दिन बीत गए।
नहीं देख पाया
पेड़ों के पीछे उसे
छिप-छिपकर उगते हुए।
नहीं सुन पाया
भोर आने से पहले
कई चिड़ियों का एक साथ कलरव।
नहीं पी पाया
दुपहरी की बेला
आम के बगीचे में झुर-झुर बहती
शीतल बयार।

उजास होते ही
गेहूँ काटने के लिए
किसानों, औरतों, बच्चों और बेटियों का जत्था
मेरे गाँव से होकर
आज भी जाता होगा।
देर रात तक
आज भी
खलिहान में
पकी हुई फ़सलों का बोझ
खनकता होगा।
हमारे सीवान की गोधूलि बेला
घर लौटते हुए
बछड़ों की हर्ष-ध्वनि से
आज भी गूँजती होगी।

फिर कब देखूँगा?
गनगनाती दुपहरिया में
सघन पत्तियों के बीच छिपा हुआ
चिड़ियों का जोड़ा।
फिर कब सुनूँगा?
कहीं दूर
किसी किसान के मुँह से
रात के सन्नाटे में छिड़ा हुआ
कबीर का निर्गुन-भजन।
फिर कब छूऊँगा?
अपनी फसलों की जड़ें
उसके तने, हरी-हरी पत्तियाँ
उसकी झुकी हुई बालियाँ।

अपने घर के पिछवाड़े
डूबते समय
डालियों, पत्तियों में झिलमिलाता हुआ सूरज
बहुत याद आता है। अपने चटक तारों के साथ
रात में जी-भरकर फैला हुआ
मेरे गाँव के बगीचे में
झरते हुए पीले-पीले पत्ते
कब देखूँगा?
उसकी डालियों, शाखाओं पर
आत्मा को तृप्त कर देने वाली
नई-नई कोंपलें कब देखूँगा?

~ भरत प्रसाद

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Final thought 

इस पोस्ट में हमने आपके साथ Poem On Nature In Hindi [प्रकृति पर कविता] शेयर की जिसे आप पढ़ सकते, अपने दोस्तों को एवं अपने घर में सुना सकते है और स्कूल में सुना सकते है। 

मुझे उम्मीद है की आपको सभी Hindi Poem On Nature पसंद आया होगा अगर इस पोस्ट से जुड़े हुए कोई प्रश्न है या सुझाव है तो कमेंट करके जरूर बताये और अगर यह पोस्ट आपको पसंद आयी हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे। 

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