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Poem

11+ Poems On Birds in Hindi | पक्षियों पर कविताएं

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इस पोस्ट में हम आपके साथ Poem On Birds In Hindi शेयर करने जा रहे है यह सभी कविताये आपके स्कूल में सुनाने/लिखने , आयोजन में सुनाने एवं अन्य जगह सुनाने में सहायक होगी। 

पक्षी प्रकृति का एक हिस्सा है यह रंग – बिरंग एवं अन्य प्रकार के पाए जाते है आपने इन्हे पेड़ों के ऊपर अवस्य देखा होगा इनके आवाज़े सुनकर हम मोहित हो जाते है एवं यह प्रकृति की खूबसूरती बताते है। 

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इस पोस्ट में आपको 11+ बेहतरीन चिड़ियों पर कविताएँ जानने को मिलेगी  जिसे आप अपने स्कूल में सुना सकते हो , मुझे उम्मीद है कि आपको यह कविताएं जरूर पसंद आएगी एवं इससे सीखने को भी जरूर मिलेगी । 

पक्षियों पर कविताएं | Poem On Birds In Hindi

पक्षियों की एक अलग ही दुनिया होती है जिसमे वो आनंद से रहते है और खुले आकाश में उड़ते है ये सभी प्रकृति का एक अनमोल तोहफा है प्रकृति ने इन्हे सुन्दर एवं रंग बिरंग का बनाया है हमे इनसे सीख लेनी चाहिए कि 

अपने जीवन में हौसला कभी कम न होने दे पक्षियों के तरह हमेशा बुलंद रखे, अच्छे goal बनाये एवं उसे छोटे छोटे तिनको से पूरा करे जैसे पक्षी घोसला बनाती है और अगर कोई चीज़ काम नहीं करती है तो निराश न होते बल्कि और अच्छे से उसपर काम करे जैसे पंक्षियों का घोसला हवा से उजर जाता है लेकिन फिर भी हो मेहनत करके उसे फिर से बनाते है। 

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इन्ही सब चीज़ो को ध्यान में रहकर कवियों ने बेहतरीन कविताये चिड़ियों पर लिखी है जिसे आप इस पोस्ट में पढ़ सकते तो , तो चलिए जानते है –

Small Hindi Poems On Birds | Panchiyon Par Kavita

छी बोला

संध्या की उदास बेला, सूखे तरुपर पंछी बोला!

आँखें खोलीं आज प्रथम, जग का वैभव लख भूला मन!

सोचा उसने-”भर दूँ अपने मादक स्वर से निखिल गगन!“

दिन भर भटक-भटक कर नभ में मिली उसे जब शान्ति नहीं,

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बैठ गया तरु पर सुस्ताने, बैठ गया होकर उन्मन!

देखा अपनी ही ज्वाला में

झुलस गई तरु की काया;

मिला न उसे स्नेह जीवन में,

मिली न कहीं तनिक छाया।

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सोच रहा-”सुख जब न विश्व में, व्यर्थ मिला ऐसा चोला।“

संध्या की उदास बेला, सूखे तरु पर पंछी बोला।

~ रामावतार यादव ‘शक्र’

मैं पंछी आज़ाद

जब-जब मुझे लगता है

कि घट रही है आकाश की ऊँचाई

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और अब कुछ ही पलों में मुझे पीसते हुए

चक्की के दो पाटों में तबदील हो जाएंगे धरती-आसमान

तब-तब बेहद सुकून देते हैं पंछी

आकाश में दूर-दूर तक उड़ते ढेर सारे पंछी

बादलों को चोंच मारते

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अपनी कोमल लेकिन धारदार पाँखों से

हवा में दरारें पैदा करते ढेर सारे पंछी

ढेर सारे पंछी

धरती और आकाश के बीच

चक्कर मारते हुए

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हमें एहसास दिला जाते हैं

आसमान के अनंत विस्तार

और अकूत ऊँचाई का!

पंछी का यही आस विश्वास

पंछी का यही आस विश्वास, पंख पसारे उड़ता जाये।

निर्मल नीरव आकाश, पंछी का यही आस विश्वास।।

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पिंजड़े की कारा की काया में, उजियारी अँधियारी छाया में।

चंदा के दर्पण की माया में अजगर काल का उगल रहा है

कालकूट उच्छवास पंछी का यही आस विश्वास।।

भंवराती नदियाँ गहरी बहता निर्मल पानी।

घाट बदलते हैं लेकिन तट पूलों की मनमानी

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टूट रहा तन, भीग रहा क्षण, मन करता नादानी।।

निदियारी आँखों में होता, चिर विराम का आभास।

पंछी का यही आस विश्वास।।

किया नीड़ निर्माण, हुआ उसका फिर अवसान।

काली रात डोंगर की बैरी, बीत गया दिनमान।।

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डाल पात पर व्यर्थ की भटकन, न हुई निज से पहचान।

सूखे पत्ते झर-झर पड़ते, करते फागुन का उपहास

पंछी का यही आस विश्वास।।

पंख पसारे उड़ता जाये।

निर्मल नीरव आकाश।।

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ये भगवान के डाकिये हैं

ये भगवान के डाकिये हैं ।

जो एक महादेश से दूसरे महादेश को जाते हैं।।

हम तो समझ नहीं पाते हैं ।

मगर उनकी लायी चिठि्ठयाँ।।

पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं।

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हम तो केवल यह आँकते हैं।।

कि एक देश की धरती।

दूसरे देश को सुगन्ध भेजती है।।

और वह सौरभ हवा में तैरती हुए।

पक्षियों की पाँखों पर तिरता है।।

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और एक देश का भाप दूसरे देश का पानी।

बनकर गिरता है।।

~ रामधारी सिंह दिनकर

यह मन पंछी सा

दिशाहीन यह मन पंछी सा
आस की टहनी पर जब बैठा।
जग मकड़ी के जैसे आकर
पंखों पर इक जाल बुन गया।
सूरज की सतरंगी किरणें
ख़्वाव दिखा कर चली गईं।
सांझ ढली, सूरज डूबा
मैं जग के हाथों हार गया।

मैं पंछी आज़ाद मेरा कहीं दूर ठिकाना रे

मैं पंछी आज़ाद मेरा कहीं दूर ठिकाना रे।

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इस दुनिया के बाग़ में मेरा आना-जाना रे।।

जीवन के प्रभात में आऊँ, साँझ भये तो मैं उड़ जाऊँ।

बंधन में जो मुझ को बांधे, वो दीवाना रे।। मैं पंछी…

दिल में किसी की याद जब आए, आँखों में मस्ती लहराए।

जनम-जनम का मेरा किसी से प्यार पुराना रे।। मैं पंछी…

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Poem On Birds In Hindi For Class 7

प्यार पंछी सोच पिंजरा दोनों अपने साथ हैं

प्यार पंछी सोच पिंजरा दोनों अपने साथ हैं,

एक सच्चा, एक झूठा, दोनों अपने साथ हैं,

आसमाँ के साथ हमको ये जमीं भी चाहिए,

भोर बिटिया, साँझ माता दोनों अपने साथ हैं।

आग की दस्तार बाँधी, फूल की बारिश हुई,

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धूप पर्वत, शाम झरना, दोनों अपने साथ हैं।

ये बदन की दुनियादारी और मेरा दरवेश दिल,

झूठ माटी, साँच सोना, दोनों अपने साथ हैं।

वो जवानी चार दिन की चाँदनी थी अब कहाँ,

आज बचपन और बुढ़ापा दोनों अपने साथ हैं।

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मेरा और सूरज का रिश्ता बाप बेटे का सफ़र,

चंदा मामा, गंगा मैया, दोनों अपने साथ हैं।

जो मिला वो खो गया, जो खो गया वो मिल गया,

आने वाला, जाने वाला, दोनों अपने साथ हैं।

~ बशीर बद्र

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कौन देस से आए ये पंछी

कौन देस से आए ये पंछी

कौन देस को जाएंगे

क्या-क्या सुख लाए ये पंछी

क्या-क्या दुख दे जाएंगे

पंछी की उड़ान औ’ पानी

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की धारा को कोई सहज समझ नहीं पाता

पंछी कैसे आते हैं

पानी कैसे बहता है

अगर कोई समझता है भी

मुझको नहीं बतलाता है।

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~ कुमार विकल

कलरव करती सारी चिड़िया

कलरव करती सारी चिड़िया,

लगती कितनी प्यारी चिड़िया

दाना चुगती, नीड बनाती,

श्रम से कभी न हारी चिड़िया

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भूरी, लाल, हरी, मटमैली,

श्रंग-रंग की न्यारी चिड़िया

छोटे-छोटे पर है लेकिन,

मीलो उड़े हमारी चिड़िया

कौन सिखाता है चिड़ियों को

कौन सिखाता है चिड़ियों को,

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ची ची ची ची करना ?

कौन सिखाता फुदक फुदक कर,-

उनको चलना फिरना ?

कौन सिखाता फुर्र से उड़ना,

दाने चुग-चुग खाना ?

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कौन सिखाता तिनके ला ला,

कर घोंसले बनाना ?

कुदरत का यह खेल वही,

हम सबको, सब कुछ देती,

किन्तु नहीं बदले में हमसे,

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वह कुछ भी है लेती ||

~ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

Birds Poem In Hindi

चिड़िया निकली है आज लेने को दाना

चिड़िया निकली है आज लेने को दाना

समय रहते फिर है उसे घर आना

आसान न होता ये सब कर पाना

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कड़ी धूप में करना संघर्ष पाने को दाना

फिर भी निकली है दाने की तलाश में

क्योकि बच्चे है उसके खाने की आस में

आज दाना नही है आस पास में

पाने को दाना उड़ी है दूर आकाश में

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आखिर मेहनत लायी उसकी रंग मिल गया

उसे अपने दाने का कण पकड़ा

उसको अपनी चोंच के संग

ओर फिर उड़ी आकाश में जलाने को

अपने पंख भोर हुई पहुँची अपने ठिकाने को

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बच्चे देख रहे थे राह उसकी आने को

माँ को देख बच्चे छुपा ना पाए अपने मुस्कुराने को

माँ ने दिया दाना सबको खाने को

दिन भर की मेहनत आग लगा देती है

पर बच्चो की मुस्कान सब भुला देती है

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वो नन्ही सी जान उसे जीने की वजह देती है

बच्चो के लिए माँ अपना सब कुछ लगा देती है

फिर होता है रात का आना सब सोते है

खाकर खाना चिड़िया सोचती है

क्या कल आसान होगा पाना दाना

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पर अपने बच्चो के लिए उसे कर है दिखाना

अगली सुबह चिड़िया फिर उड़ती है लेने को दाना

गाते हुए एक विस्वास भरा गाना

~ आशीष राजपुरोहित

चिड़िया रानी

प्रात: होते ही चिड़िया रानी, बगिया में आ जाती,

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चूं चूं करके शोर मचाकर बिस्तर में मुझे जगाती |

तिलगोजे जैसी चोंच है उसकी,

मोती जैसी आंखें |

छोटे छोटे पंजे उसके

रेशम जैसी आंखें |

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मीठे मीठे गीत सुनाकर,

तू सबका मन बहलाती |

छोटे छोटे दाने चुग कर

बड़े चाव से खाती |

चारो तरफ फुदक फुदक कर,

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तू अपना नाच दिखाती |

नन्हे नन्हे तिनके चुनकर,

तू अपना घोंसला बनाती |

रात होते ही झट से

तू घोंसले में घुस जाती |

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पेड़ो की शाखाओ में तू,

सोने की चिड़िया

सोने की चिड़िया कहे जानेवाले देश में

सफेद बगुलों ने आश्वासनों के इन्द्रधनुषी

सपने दिखाकर निरीह मेमनों की आंखें

फोड़ डाली हैं

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मेमने दाना-पानी की जुगाड़ में व्यस्त हैं.

सफेद बगुले आलीशान पंचतारा होटलों

में आजादी का जश्न मना रहे हैं

प्रवासी पक्षियों के समूह सोने की चिड़िया

कहे जाने वाले देश के वृक्षों पर अपने घोंसले

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बना रहे हैं और देशी चिड़ियों के समूह

खाली वृक्ष की तलाश में भटक रहे हैं

कुछेक साल देशी चिड़िया को लगातार सौंदर्य

का ताज पहनाया गया और प्रवासी पक्षी

अपना स्थान बनाने की खुशी में गीत गुनगुना रहे हैं

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वृक्ष पर बैठे प्रवासी पक्षियों की बीट से

पुण्य भूमि पर पाश्चात्य गंदगी फैल रही है

विश्व गुरु कहे जानेवाले देश में गुरु पीटे जा रहे हैं

और चेले प्रेमिकाओं संग व्यस्त हैं

शिक्षा व्यवस्था का बोझ गदहों की पीठ पर

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लाद दिया गया है

अपने निहित स्वार्थ के लिए सफेद

बगुले लगातार देश को बांटने की साजिश में लगे हैं

देश जितना बंटेगा कुर्सियां उतनी ही सुरक्षित होंगी

महाभारत आज भी जारी है

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भूखे-नंगे लोग युद्ध क्या करेंगे, मारे जा रहे हैं

बिसात आज भी बिछी है

द्युत खेला जा रहा है ‘कौन बनेगा करोड़पति’

जैसे टीवी सीरियल देखकर बच्चे ही नहीं,

तथाकथित बुद्धिजीवी भी फोन डायल कर रहे हैं

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हवा में तैर रहा है बिना परिश्रम के

करोड़पति बनने का सवाल –

प्रवासी पक्षी अगली सदी तक कितने अण्डे देंगे?

~ राकेश प्रियदर्शी

Poem On Birds In Hindi For Class 9

हम पक्षी हुए होते

काश !

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हम पक्षी हुए होते

इन्हीं आदिम जंगलों में घूमते हम

नदी का इतिहास पढ़ते

दूर तक फैली हुई इन घाटियों में

पर्वतों के छोर छूते

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रास रचते इन वनैली वीथियों में

फुनगियों से

बहुत ऊपर चढ़

हवा में नाचते हम

इधर जो पगडंडियाँ हैं

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वे यहीं हैं खत्म हो जातीं

बहुत नीचे खाई में फिरती हवाएँ

हमें गुहरातीं

काश !

उड़कर

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उन सभी गहराइयों को नापते हम

अभी गुज़रा है इधर से

एक नीला बाज़ जो पर तोलता

दूर दिखती हिमशिला का

राज़ वह है खोलता

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काश !

हम होते वहीं

तो हिमगुफा के सुरों की आलापते हम

~ कुमार रवींद्र

एक मुक्त पक्षी उछलता

एक मुक्त पक्षी उछलता

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हवा में और उड़ता चला जाता

जहाँ-जहाँ तक बहाव

समोता अपने पंख नारंगी सूर्य किरणों में

जमाता आकाश पर अपना अधिकार।

लेकिन वह पक्षी जो करता विचरण अपने सँकरे पिंजरे में

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कदाचित ही वह हो पाता अपने क्रोध से बाहर

काट दिए गए हैं उसके पंख, बान्ध दिए गए हैं पैर

इसलिए खोलता अपना गला वह गान के लिए।

गाता है पिंजरे का पक्षी भयाकुल स्वर में

गीत अज्ञात पर जिसकी चाह आज भी

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उसकी यह धुन सुनाई देती सुदूर पहाड़ी तक

कि पिंजरे का पक्षी गाता है मुक्ति का गीत।

मुक्त पक्षी का इरादा एक और उड़ान का

और मौसमी बयार बहती मन्द-मन्द

होती सरसराहट वृक्षों की

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मोटी कृमियाँ करती प्रतीक्षा सुबह चमकीले लॉन में

और आकाश को करता वह अपने नाम।

लेकिन पिंजरे का पक्षी खड़ा है अपने सपनों की क़ब्र पर

दु:स्वप्न की कराह पर चीख़ती है उसकी परछाई

काट दिए गए हैं उसके पंख, बाँध दिए गए हैं पैर

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इसलिए खोलता अपना गला वह गान के लिए।

गाता है पिंजरे का पक्षी

भयाकुल स्वर में गीत अज्ञात

पर जिसकी चाह आज भी

उसकी यह धुन सुनाई देती सुदूर पहाड़ी तक

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कि पिंजरे का पक्षी गाता है मुक्ति का गीत।

मैं भी अगर एक छोटा पंछी होता

मैं भी अगर एक छोटा पंछी होता।

तो बस्ती-बस्ती में फिरता रहता।।

सुन्दर नग-नद-नालों का यार होता।

मस्ती में अपनी झूमता रहता । मैं भी अगर ….।।

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आदमी का गुण मुझ में न होता।

ईर्ष्या की आग में न जलाता होता।।

स्वार्थ के युद्ध में न मरता-मारता।

बम्ब-मिसाइल की वर्षा न करता । मैं भी अगर….।।

आंखों में दौलत का काजल न पुतता।

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शान के लिए पराया माल न हड़पता।।

हर मानव मेरा हित-बंधु होता।

रंग-रूप पर अपना गर्व करता । मैं भी अगर….।।

तब सारा जग मेरा अपना होता।

पासपोर्ट-वीज़ा कोई न खोजता।।

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स्वच्छन्द वन-वन में घूमता होता।

विश्व –भर मेरा अपना राज्य होता । मैं भी अगर ….।।

प्यार के गीत जन-जन को सुनाता।

आवाज़ से अपनी सब को लुभाता।।

मानवता की वेदी पर सिर झुकाता, सागर की उर्मिल का झूला झूलता ।

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मैं भी अगर एक छोटा पंछी होता ।।

~ जनार्दन कालीचरण

चिड़िया निकली है आज लेने को दाना

चिड़िया निकली है आज लेने को दाना।

समय रहते फिर है उसे घर आना।।

आसान न होता ये सब कर पाना।

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कड़ी धूप में करना संघर्ष पाने को दाना।।

फिर भी निकली है दाने की तलाश में।

क्योकि बच्चे है उसके खाने की आस में।।

आज दाना नही है आस पास में।

पाने को दाना उड़ी है दूर आकाश में।।

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आखिर मेहनत लायी उसकी रंग मिल गया।

उसे अपने दाने का कण पकड़ा।।

उसको अपनी चोंच के संग।

ओर फिर उड़ी आकाश में जलाने को।।

अपने पंख भोर हुई पहुँची अपने ठिकाने को।

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बच्चे देख रहे थे राह उसकी आने को।।

माँ को देख बच्चे छुपा ना पाए अपने मुस्कुराने को।

माँ ने दिया दाना सबको खाने को।।

दिन भर की मेहनत आग लगा देती है।

पर बच्चो की मुस्कान सब भुला देती है।।

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वो नन्ही सी जान उसे जीने की वजह देती है।

बच्चो के लिए माँ अपना सब कुछ लगा देती है।।

फिर होता है रात का आना सब सोते है।

खाकर खाना चिड़िया सोचती है।।

क्या कल आसान होगा पाना दाना।

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पर अपने बच्चो के लिए उसे कर है दिखाना।।

अगली सुबह चिड़िया फिर उड़ती है लेने को दाना।

गाते हुए एक विस्वास भरा गाना।।

~ आशीष राजपुरोहित

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Final thought

इस पोस्ट में हमने आपके साथ पक्षियों पर कविताएं [Poem On Birds In Hindi] शेयर की यह आपके स्कूल में सुनाने में सहायक होगी एवं मुझे उम्मीद है कि इन कविताओं से आपको सिखने को भी जरूर मिला होगा। 

अगर इस पोस्ट से जुड़े कोई प्रश्न या सुझाव है तो कमेंट जरूर करे और आपको यदि यह पोस्ट पसंद आयी हो तो अपने दोस्तों के साथ इस पोस्ट को शेयर जरूर करे। 

admin

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