20+ Patriotism Poems in Hindi | Desh Bhakti Poem in Hindi

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इस पोस्ट में हम आपके साथ Patriotism Poems in Hindi [देशभक्ति कविता] शेयर करने जा रहे है आप यह कविताएं 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस में सुनाने में सहायक होगी।

इस पोस्ट में 20 + कविताओं  को संगृहीत करके शेयर किया गया है सभी देश भक्ति पर आधारित है जिसे आप अपने स्कूल या किसी समारोह आयोजन में सुना सकते हो  , इस पोस्ट को अंत तक पढ़े यह आपके लिए काफी उपयोगी होने वाली है। 

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Patriotism Poems in Hindi
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 Patriotism Poems in Hindi [देशभक्ति कविता]

यह सभी देश भक्ति कविता काफी अच्छे तरह प्रसिद्ध कवियों द्वारा लिखी गई हैं आपने एक न एक बार  इसमें से किसी एक को स्कूल में जरूर पढ़ा होगा, यह कविता देशप्रेम की भावना को जागृत करती है एवं हमे स्वतंत्रता सेनानियों और वीर सपूतों की याद दिलाती है। 

इस पोस्ट को हम 2 भागों में बाँटा हुआ है 1st Short poem एवं 2nd long/normal poem, इससे आपको अपनी पसंदीदा  व महत्वपूर्ण poem ढूंढने में आसानी होगी, तो चलिए जानते है। … 

ये सभी कविताये हमने इंटरनेट पर से एवं सोशल साइट से कलेक्ट की है ये हमारे द्वारा लिखी गयी नहीं है इन कविताओं को कवियों के द्वारा लिखा गया है इसलिए मै आभारी हु उन सभी कवियों के लिए जिन्होंने बेहतरीन कविताओं को लिखा है।

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Short Patriotic Poems In Hindi

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएं झाँकी हिंदुस्तान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम …

उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है

दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है

जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है

बाट-बाट पे हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है

देखो ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की,

इस मिट्टी से …

ये है अपना राजपूताना नाज़ इसे तलवारों पे

इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे

ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे

कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पद्‍मिनियाँ अंगारों पे

बोल रही है कण कण से कुरबानी राजस्थान की

इस मिट्टी से …

देखो मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था

मुग़लों की ताकत को जिसने तलवारों पे तोला था

हर पावत पे आग लगी थी हर पत्थर एक शोला था

बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था

यहाँ शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की

इस मिट्टी से …

जलियाँ वाला बाग ये देखो यहाँ चली थी गोलियाँ

ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलियाँ

एक तरफ़ बंदूकें दन दन एक तरफ़ थी टोलियाँ

मरनेवाले बोल रहे थे इनक़लाब की बोलियाँ

यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाजी अपनी जान की

इस मिट्टी से …

ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है

यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है

ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है

मुट्ठी में तूफ़ान बंधा है और प्राण में ज्वाला है

जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की

इस मिट्टी से …

~ प्रदीप

सारे जहाँ से अच्छा

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

हम बुलबुलें हैं इसकी वह गुलिस्तां हमारा ॥

ग़ुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन में।

समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा ॥

परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमां का।

वो संतरी हमारा वो पासवां हमारा ॥

गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियां।

गुलशन है जिसके दम से रश्के जिनां हमारा॥

ऐ आबे रोदे गंगा वह दिन है याद तुझको।

उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा ॥

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।

हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा ॥

यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गए जहां से।

अब तक मगर है बाकी नामों निशां हमारा ॥

कुछ बात है कि हस्ती मिटती मिटाये।

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा ॥

‘इक़बाल’ कोई महरम अपना नहीं जहां में।

मालूम क्या किसी को दर्दे निहां हमारा ॥

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

हम बुलबुलें हैं इसकी यह गुलिसतां हमारा॥

~ इक़बाल

आज तिरंगा फहराता है

आज तिरंगा फहराता है अपनी पूरी शान से।

हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

आज़ादी के लिए हमारी लंबी चली लड़ाई थी।

लाखों लोगों ने प्राणों से कीमत बड़ी चुकाई थी।।

व्यापारी बनकर आए और छल से हम पर राज किया।

हमको आपस में लड़वाने की नीति अपनाई थी।।

हमने अपना गौरव पाया, अपने स्वाभिमान से।

हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

गांधी, तिलक, सुभाष, जवाहर का प्यारा यह देश है।

जियो और जीने दो का सबको देता संदेश है।।

प्रहरी बनकर खड़ा हिमालय जिसके उत्तर द्वार पर।

हिंद महासागर दक्षिण में इसके लिए विशेष है।।

लगी गूँजने दसों दिशाएँ वीरों के यशगान से।

हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

हमें हमारी मातृभूमि से इतना मिला दुलार है।

उसके आँचल की छैयाँ से छोटा ये संसार है।।

हम न कभी हिंसा के आगे अपना शीश झुकाएँगे।

सच पूछो तो पूरा विश्व हमारा ही परिवार है।।

जय जय प्यारा, जग से न्यारा

जय जय प्यारा, जग से न्यारा,

शोभित सारा, देश हमारा,

जगत-मुकुट, जगदीश दुलारा

जग-सौभाग्य सुदेश!

जय जय प्यारा भारत देश।

प्यारा देश, जय देशेश,

जय अशेष, सदस्य विशेष,

जहाँ न संभव अध का लेश,

केवल पुण्य प्रवेश।

जय जय प्यारा भारत देश।

स्वर्गिक शीश-फूल पृथ्वी का,

प्रेम मूल, प्रिय लोकत्रयी का,

सुललित प्रकृति नटी का टीका

ज्यों निशि का राकेश।

जय जय प्यारा भारत देश।

जय जय शुभ्र हिमाचल शृंगा

कलरव-निरत कलोलिनी गंगा

भानु प्रताप-चमत्कृत अंगा,

तेज पुंज तपवेश।

जय जय प्यारा भारत देश।

जगमें कोटि-कोटि जुग जीवें,

जीवन-सुलभ अमी-रस पीवे,

सुखद वितान सुकृत का सीवे,

रहे स्वतंत्र हमेश

जय जय प्यारा भारत देश।

~ श्रीधर पाठक

हरी भरी धरती हो

हरी भरी धरती हो

नीला आसमान रहे

फहराता तिरँगा,

चाँद तारों के समान रहे।

त्याग शूर वीरता

महानता का मंत्र है

मेरा यह देश

एक अभिनव गणतंत्र है

शांति अमन चैन रहे,

खुशहाली छाये

बच्चों को बूढों को

सबको हर्षाये

हम सबके चेहरो पर

फैली मुस्कान रहे

फहराता तिरँगा चाँद

तारों के समान रहे।

~ कमलेश कुमार दीवान

मेरा वतन वही है

चिश्ती ने जिस ज़मीं पे पैग़ामे हक़ सुनाया,

नानक ने जिस चमन में बदहत का गीत गाया,

तातारियों ने जिसको अपना वतन बनाया,

जिसने हेजाजियों से दश्ते अरब छुड़ाया,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

सारे जहाँ को जिसने इल्मो-हुनर दिया था,

यूनानियों को जिसने हैरान कर दिया था,

मिट्टी को जिसकी हक़ ने ज़र का असर दिया था

तुर्कों का जिसने दामन हीरों से भर दिया था,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

टूटे थे जो सितारे फ़ारस के आसमां से,

फिर ताब दे के जिसने चमकाए कहकशां से,

बदहत की लय सुनी थी दुनिया ने जिस मकां से,

मीरे-अरब को आई ठण्डी हवा जहाँ से,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

बंदे किलीम जिसके, परबत जहाँ के सीना,

नूहे-नबी का ठहरा, आकर जहाँ सफ़ीना,

रफ़अत है जिस ज़मीं को, बामे-फलक़ का ज़ीना,

जन्नत की ज़िन्दगी है, जिसकी फ़िज़ा में जीना,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

गौतम का जो वतन है, जापान का हरम है,

ईसा के आशिक़ों को मिस्ले-यरूशलम है,

मदफ़ून जिस ज़मीं में इस्लाम का हरम है,

हर फूल जिस चमन का, फिरदौस है, इरम है,

मेरा वतन वही है, मेरा वतन वही है॥

 ~ इक़बाल

भारत तुझको नमस्कार है

भारत तुझसे मेरा नाम है,

भारत तू ही मेरा धाम है|

भारत मेरी शोभा शान है,

भारत मेरा तीर्थ स्थान है|

भारत तू मेरा सम्मान है,

भारत तू मेरा अभिमान है|

भारत तू धर्मो का ताज है,

भारत तू सबका समाज है|

भारत तुझमें गीता सार है,

भारत तू अमृत की धार है|

भारत तू गुरुओं का देश है,

भारत तुझमें सुख सन्देश है|

भारत जबतक ये जीवन है,

भारत तुझको ही अर्पण है|

भारत तू मेरा आधार है,

भारत मुझको तुझसे प्यार है|

भारत तुझपे जा निसार है,

भारत तुझको नमस्कार है|

~ अशोक कुमार वशिष्ट

अमरपुरी से भी बढ़कर के जिसका गौरव-गान है

अमरपुरी से भी बढ़कर के जिसका गौरव-गान है

तीन लोक से न्यारा अपना प्यारा हिंदुस्तान है।

गंगा, यमुना सरस्वती से सिंचित जो गत-क्लेश है।

सजला, सफला, शस्य-श्यामला जिसकी धरा विशेष है।

ज्ञान-रश्मि जिसने बिखेर कर किया विश्व-कल्याण है-

सतत-सत्य-रत, धर्म-प्राण वह अपना भारत देश है।

यहीं मिला आकार ‘ज्ञेय’ को मिली नई सौग़ात है-

इसके ‘दर्शन’ का प्रकाश ही युग के लिए विहान है।

वेदों के मंत्रों से गुंजित स्वर जिसका निर्भ्रांत है।

प्रज्ञा की गरिमा से दीपित जग-जीवन अक्लांत है।

अंधकार में डूबी संसृति को दी जिसने दृष्टि है-

तपोभूमि वह जहाँ कर्म की सरिता बहती शांत है।

इसकी संस्कृति शुभ्र, न आक्षेपों से धूमिल कभी हुई-

अति उदात्त आदर्शों की निधियों से यह धनवान है।।

योग-भोग के बीच बना संतुलन जहाँ निष्काम है।

जिस धरती की आध्यात्मिकता, का शुचि रूप ललाम है।

निस्पृह स्वर गीता-गायक के गूँज रहें अब भी जहाँ-

कोटि-कोटि उस जन्मभूमि को श्रद्धावनत प्रणाम है।

यहाँ नीति-निर्देशक तत्वों की सत्ता महनीय है-

ऋषि-मुनियों का देश अमर यह भारतवर्ष महान है।

क्षमा, दया, धृति के पोषण का इसी भूमि को श्रेय है।

सात्विकता की मूर्ति मनोरम इसकी गाथा गेय है।

बल-विक्रम का सिंधु कि जिसके चरणों पर है लोटता-

स्वर्गादपि गरीयसी जननी अपराजिता अजेय है।

समता, ममता और एकता का पावन उद्गम यह है

देवोपम जन-जन है इसका हर पत्थर भगवान है।

~ डॉ. गणेशदत्त सारस्वत

भारत की आरती

भारत की आरती

देश-देश की स्वतंत्रता देवी

आज अमित प्रेम से उतारती ।

निकटपूर्व, पूर्व, पूर्व-दक्षिण में

जन-गण-मन इस अपूर्व शुभ क्षण में

गाते हों घर में हों या रण में

भारत की लोकतंत्र भारती।

गर्व आज करता है एशिया

अरब, चीन, मिस्र, हिंद-एशिया

उत्तर की लोक संघ शक्तियां

युग-युग की आशाएं वारतीं।

साम्राज्य पूंजी का क्षत होवे

ऊंच-नीच का विधान नत होवे

साधिकार जनता उन्नत होवे

जो समाजवाद जय पुकारती।

जन का विश्वास ही हिमालय है

भारत का जन-मन ही गंगा है

हिन्द महासागर लोकाशय है

यही शक्ति सत्य को उभारती।

यह किसान कमकर की भूमि है

पावन बलिदानों की भूमि है

भव के अरमानों की भूमि है

मानव इतिहास को संवारती।

~ शमशेर बहादुर सिंह

कुछ छोटे सपनो के बदले

कुछ छोटे सपनो के बदले,

बड़ी नींद का सौदा करने,

निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे !

वही प्यास के अनगढ़ मोती,

वही धूप की सुर्ख कहानी,

वही आंख में घुटकर मरती,

आंसू की खुद्दार जवानी,

हर मोहरे की मूक विवशता,चौसर के खाने क्या जाने

हार जीत तय करती है वे, आज कौन से घर ठहरेंगे

निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे !

कुछ पलकों में बंद चांदनी,

कुछ होठों में कैद तराने,

मंजिल के गुमनाम भरोसे,

सपनो के लाचार बहाने,

जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे,

उन के भी दुर्दम्य इरादे, वीणा के स्वर पर ठहरेंगे

निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे..!

~ कुमार विश्वास 

अमरपुरी से भी बढ़कर

अमरपुरी से भी बढ़कर के जिसका गौरव-गान है-

तीन लोक से न्यारा अपना प्यारा हिंदुस्तान है।

गंगा, यमुना सरस्वती से सिंचित जो गत-क्लेश है।

सजला, सफला, शस्य-श्यामला जिसकी धरा विशेष है।

ज्ञान-रश्मि जिसने बिखेर कर किया विश्व-कल्याण है-

सतत-सत्य-रत, धर्म-प्राण वह अपना भारत देश है।

यहीं मिला आकार ‘ज्ञेय’ को मिली नई सौग़ात है-

इसके ‘दर्शन’ का प्रकाश ही युग के लिए विहान है।

वेदों के मंत्रों से गुंजित स्वर जिसका निर्भ्रांत है।

प्रज्ञा की गरिमा से दीपित जग-जीवन अक्लांत है।

अंधकार में डूबी संसृति को दी जिसने दृष्टि है-

तपोभूमि वह जहाँ कर्म की सरिता बहती शांत है।

इसकी संस्कृति शुभ्र, न आक्षेपों से धूमिल कभी हुई-

अति उदात्त आदर्शों की निधियों से यह धनवान है।।

योग-भोग के बीच बना संतुलन जहाँ निष्काम है।

जिस धरती की आध्यात्मिकता, का शुचि रूप ललाम है।

निस्पृह स्वर गीता-गायक के गूँज रहें अब भी जहाँ-

कोटि-कोटि उस जन्मभूमि को श्रद्धावनत प्रणाम है।

यहाँ नीति-निर्देशक तत्वों की सत्ता महनीय है-

ऋषि-मुनियों का देश अमर यह भारतवर्ष महान है।

क्षमा, दया, धृति के पोषण का इसी भूमि को श्रेय है।

सात्विकता की मूर्ति मनोरम इसकी गाथा गेय है।

बल-विक्रम का सिंधु कि जिसके चरणों पर है लोटता-

स्वर्गादपि गरीयसी जननी अपराजिता अजेय है।

समता, ममता और एकता का पावन उद्गम यह है

देवोपम जन-जन है इसका हर पत्थर भगवान है।

~ डॉ. गणेशदत्त सारस्वत

Patriotic Poems In Hindi By Rabindranath Tagore – विपदाओं से रक्षा करो

विपदाओं से रक्षा करो – यह न मेरी प्रार्थना,

यह करो : विपद् में न हो भय।

दुख से व्यथित मन को मेरे

भले न हो सांत्वना,

यह करो : दुख पर मिले विजय।

मिल सके न यदि सहारा,

अपना बल न करे किनारा;-

क्षति ही क्षति मिले जगत् में

मिले केवल वंचना,

मन में जगत् में न लगे क्षय।

करो तुम्हीं त्राण मेरा-

यह न मेरी प्रार्थना,

तरण शक्ति रहे अनामय।

भार भले कम न करो,

भले न दो सांत्वना,

यह करो : ढो सकूँ भार-वय।

सिर नवाकर झेलूँगा सुख,

पहचानूँगा तुम्हारा मुख,

मगर दुख-निशा में सारा

जग करे जब वंचना,

यह करो : तुममें न हो संशय।

~ रबिन्द्रनाथ टैगोर

वंदे मातरम् कविता 

छीन सकती है नहीं सरकार वंदे मातरम्,

हम ग़रीबों के गले का हार वंदे मातरम्।

सरचढ़ों के सर में चक्कर उस समय आता ज़रूर,

कान में पहुंची जहां झनकार वंदे मातरम्।

जेल में चक्की घसीटे, भूख से हो मर रहा,

उस समय भी बक रहा बेज़ार वंदे मातरम्।

मौत के मुंह में खड़ा है, कह रहा जल्लाद से,

भोंक दे सीने में वह तलवार, वंदे मातरम्।

डाक्टरों ने नब्ज़ देखी, सर हिलाकर कह दिया,

हो गया इसको तो यह आज़ार वंदे मातरम्।

ईद, होली, दशहरा, शबरात से भी सौ गुना,

है हमारा लाड़ला त्योहार वंदे मातरम्।

ज़ालिमों का जुल्म भी काफूर-सा उड़ जाएगा,

फैसला होगा सरे दरबार वंदे मातरम्।

आज़ादी अभी अधूरी है।

पन्द्रह अगस्त का दिन कहता – आज़ादी अभी अधूरी है।

सपने सच होने बाक़ी हैं, राखी की शपथ न पूरी है॥

जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई।

वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं।

उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती।

तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है।

इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥

भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं।

सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया।

पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है।

कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे।

गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।

जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥

~ अटल बिहारी वाजपेयी

यह है भारत देश हमारा

चमक रहा उत्तुंग हिमालय, यह नगराज हमारा ही है।

जोड़ नहीं धरती पर जिसका, वह नगराज हमारा ही है।

नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस धारा,

बहती है क्या कहीं और भी, ऎसी पावन कल-कल धारा?

सम्मानित जो सकल विश्व में, महिमा जिनकी बहुत रही है

अमर ग्रन्थ वे सभी हमारे, उपनिषदों का देश यही है।

गाएँगे यश ह्म सब इसका, यह है स्वर्णिम देश हमारा,

आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा।

यह है भारत देश हमारा, महारथी कई हुए जहाँ पर,

यह है देश मही का स्वर्णिम, ऋषियों ने तप किए जहाँ पर,

यह है देश जहाँ नारद के, गूँजे मधुमय गान कभी थे,

यह है देश जहाँ पर बनते, सर्वोत्तम सामान सभी थे।

यह है देश हमारा भारत, पूर्ण ज्ञान का शुभ्र निकेतन,

यह है देश जहाँ पर बरसी, बुद्धदेव की करुणा चेतन,

है महान, अति भव्य पुरातन, गूँजेगा यह गान हमारा,

है क्या हम-सा कोई जग में, यह है भारत देश हमारा।

विघ्नों का दल चढ़ आए तो, उन्हें देख भयभीत न होंगे,

अब न रहेंगे दलित-दीन हम, कहीं किसी से हीन न होंगे,

क्षुद्र स्वार्थ की ख़ातिर हम तो, कभी न ओछे कर्म करेंगे,

पुण्यभूमि यह भारत माता, जग की हम तो भीख न लेंगे।

मिसरी-मधु-मेवा-फल सारे, देती हमको सदा यही है,

कदली, चावल, अन्न विविध अरु क्षीर सुधामय लुटा रही है,

आर्य-भूमि उत्कर्षमयी यह, गूँजेगा यह गान हमारा,

कौन करेगा समता इसकी, महिमामय यह देश हमारा।

~ सुब्रह्मण्यम भारती

Hindi Poem On Patriotism

अलग अलग गलियों

अलग अलग गलियों कुचों में लोग कोन गिनता है|

साथ खड़े हों रहने वाले, देश तभी बनता है||

बड़ी बड़ी हम देश प्रेम की बात किये जाते हैं|

वक्त पड़े तो अपनों के भी काम नही आते हैं||

सरहद की रखवाली को सेना अपनी करती है|

पर अंदर सडकों पर लड़की चलने में डरती है||

युवा शक्ति का नारा सुनने में अक्सर आता है|

सही दिशा भी किसी युवा को नहीं दिखा पाता है||

खेत हमारी पूँजी है, और फसल हमारे गहने|

क्यों किसान फिर कहीं लगे हैं जान स्वयं की लेने||

थल सजा है कहीं परन्तु भूख नहीं लगती है|

किसी की बेटी भूख के मारे रात रात जगती है||

क्या सडसठ सालों में ये आजाद वतन अपना है|

क्या यही भगत सिंह और महात्मा गाँधी का सपना है||

क्या इसीलिए आज़ाद गोली खुद को मारी|

क्या इसीलिए रण में कूदी वह नन्ही सी झलकारी||

क्या इसीलिए बिस्मिल ने ‘फिर आऊंगा’ कह डाला था|

क्या ऊधम सिंह ने क्रोध को अपने इसलिए पाला था|

गर नहीं तो फिर कैसे चूके हम राष्ट्र नया गढ़ने में|

जिस आज़ादी के लिए लड़े उसकी इज्जत करने में||

जो फूल सूख कर बिखर गया वह फिर से नही खिलेगा|

जो समय हाथ से निकल गया वह वापस नहीं मिलेगा||

पर अक्लमंद को एक इशारा ही काफ़ी होता है|

सुधार ही हर गलती के लिए असली माफ़ी होता है||

देश प्रेम और राष्ट्रवाद के गान नहीं गाओ तुम|

अपने अंदर बसे भगत सिंह को जरा जगाओं तुम||

मंजिल दूर नहीं राही जब करले अटल इरादा|

अपना हाथ उठा कर ख़ुद से आज करो ये वादा||

मेरे सामने कोई कभी भी भूख से नही मरेगा|

मेरे रहते अन्याय से कोई नहीं डरेगा||

मैं पहले उसका जिसकी तत्काल मदद करनी है|

अपने आगे हर पीड़ित की हर पीड़ा हरनी है||

शपथ गृहण कर आज़ादी का उत्सव आज मनाते हैं|

देश बुलाता है आओ कुछ काम तो इसके आते हैं||

|| वन्दे मातरम् – भारत माता की जय ||

जाग रहे हम वीर जवान

जाग रहे हम वीर जवान,

जियो जियो अय हिन्दुस्तान !

हम प्रभात की नई किरण हैं, हम दिन के आलोक नवल,

हम नवीन भारत के सैनिक, धीर,वीर,गंभीर, अचल ।

हम प्रहरी उँचे हिमाद्रि के, सुरभि स्वर्ग की लेते हैं ।

हम हैं शान्तिदूत धरणी के, छाँह सभी को देते हैं।

वीर-प्रसू माँ की आँखों के हम नवीन उजियाले हैं

गंगा, यमुना, हिन्द महासागर के हम रखवाले हैं।

तन मन धन तुम पर कुर्बान,

जियो जियो अय हिन्दुस्तान !

हम सपूत उनके जो नर थे अनल और मधु मिश्रण,

जिसमें नर का तेज प्रखर था, भीतर था नारी का मन !

एक नयन संजीवन जिनका, एक नयन था हालाहल,

जितना कठिन खड्ग था कर में उतना ही अंतर कोमल।

थर-थर तीनों लोक काँपते थे जिनकी ललकारों पर,

स्वर्ग नाचता था रण में जिनकी पवित्र तलवारों पर

हम उन वीरों की सन्तान ,

जियो जियो अय हिन्दुस्तान !

हम शकारि विक्रमादित्य हैं अरिदल को दलनेवाले,

रण में ज़मीं नहीं, दुश्मन की लाशों पर चलनेंवाले।

हम अर्जुन, हम भीम, शान्ति के लिये जगत में जीते हैं

मगर, शत्रु हठ करे अगर तो, लहू वक्ष का पीते हैं।

हम हैं शिवा-प्रताप रोटियाँ भले घास की खाएंगे,

मगर, किसी ज़ुल्मी के आगे मस्तक नहीं झुकायेंगे।

देंगे जान , नहीं ईमान,

जियो जियो अय हिन्दुस्तान।

जियो, जियो अय देश! कि पहरे पर ही जगे हुए हैं हम।

वन, पर्वत, हर तरफ़ चौकसी में ही लगे हुए हैं हम।

हिन्द-सिन्धु की कसम, कौन इस पर जहाज ला सकता ।

सरहद के भीतर कोई दुश्मन कैसे आ सकता है ?

पर की हम कुछ नहीं चाहते, अपनी किन्तु बचायेंगे,

जिसकी उँगली उठी उसे हम यमपुर को पहुँचायेंगे।

हम प्रहरी यमराज समान

जियो जियो अय हिन्दुस्तान!

~ रामधारी सिंह दिनकर

झांसी की रानी 

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,

बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,

देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,

सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।

महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,

ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,

सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आयी थी झांसी में।

चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,

किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,

रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,

लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,

व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,

राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।

रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,

कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,

उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?

जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,

उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,

‘नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,

नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।

हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,

यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,

मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,

जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,

जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,

रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,

घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,

विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,

किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,

रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,

मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,

हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,

यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,

हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

~ सुभद्राकुमारी चौहान

वह देश, देश क्या है, जिसमें

वह देश, देश क्या है, जिसमें

लेते हों जन्म शहीद नहीं।

वह खाक जवानी है जिसमें

मर मिटने की उम्मीद नहीं।

वह मां बेकार सपूती है,

जिसने कायर सुत जाया है।

वह पूत, पूत क्या है जिसने

माता का दूध लजाया है।

सुख पाया तो इतरा जाना,

दुःख पाया तो कुम्हला जाना।

यह भी क्या कोई जीवन है:

पैदा होना, फिर मर जाना!

पैदा हो तो फिर ऐसा हो,

जैसे तांत्या बलवान हुआ।

मरना हो तो फिर ऐसे मर,

ज्यों भगतसिंह कुर्बान हुआ।

जीना हो तो वह ठान ठान,

जो कुंवरसिंह ने ठानी थी।

या जीवन पाकर अमर हुई

जैसे झांसी की रानी थी।

यदि कुछ भी तुझ में जीवन है,

तो बात याद कर राणा की।

दिल्ली के शाह बहादुर की

औ कानपूर के नाना की।

तू बात याद कर मेरठ की,

मत भूल अवध की घातों को।

कर सत्तावन के दिवस याद,

मत भूल गदर की बातों को।

आज़ादी के परवानों ने जब

खूं से होली खेली थी।

माता के मुक्त कराने को

सीने पर गोली झेली थी।

तोपों पर पीठ बंधाई थी,

पेड़ों पर फांसी खाई थी।

पर उन दीवानों के मुख पर

रत्ती-भर शिकन न आई थी।

वे भी घर के उजियारे थे

अपनी माता के बारे थे।

बहनों के बंधु दुलारे थे,

अपनी पत्नी के प्यारे थे।

पर आदर्शों की खातिर जो

भर अपने जी में जोम गए।

भारतमाता की मुक्ति हेतु,

अपने शरीर को होम गए।

कर याद कि तू भी उनका ही

वंशज है, भारतवासी है।

यह जननी, जन्म-भूमि अब भी,

कुछ बलिदानों की प्यासी है।

अंग्रेज गए जैसे-तैसे,

लेकिन अंग्रेजी बाकी है।

उनके बुत छाती पर बैठे,

ज़हनियत अभी वह बाकी है।

कर याद कि जो भी शोषक है

उसको ही तुझे मिटाना है।

ले समझ कि जो अन्यायी है

आसन से उसे हटाना है।

ऐसा करने में भले प्राण

जाते हों तेरे, जाने दे।

अपने अंगों की रक्त-माल

मानवता पर चढ़ जाने दे।

तू जिन्दा हो और जन्म-भूमि

बन्दी हो तो धिक्कार तुझे।

भोजन जलते अंगार तुझे,

पानी है विष की धार तुझे।

जीवन-यौवन की गंगा में

तू भी कुछ पुण्य कमा ले रे!

मिल जाए अगर सौभाग्य

शहीदों में तू नाम लिखा ले रे!

~ गोपाल प्रसाद व्यास

ललकार

तूने गर ठान लिया जुल्म ही करने के लिए,

हम भी तैयार हैं अब जी से गुज़रने के लिए।

अब नहीं हिंद वह जिसको दबाए बैठे थे,

जाग उठे नींद से, हां हम तो सम्हलने के लिए।

हाय, भारत को किया तूने है ग़ारत कैसा!

लूटकर छोड़ दिया हमको तो मरने के लिए।

भीख मंगवाई है दर-दर हमंे भूखा मारा,

हिंद का माल विलायत को ही भरने के लिए।

लाजपत, गांधी व शौकत का बजाकर डंका,

सीना खोले हैं खड़े गोलियां खाने के लिए।

तोप चरख़े की बनाकर तुम्हें मारेंगे हम,

अब न छोड़ेंगे तुम्हें फिर से उभरने के लिए।

दास, शौकत व मुहम्मद को बनाकर कै़दी,

छेड़ा है हिंद को अब सामना करने के लिए।

बच्चे से बूढ़े तलक आज हैं तैयार सभी,

डाल दो हथकड़ियां जेल को भरने के लिए।

उठो, आओ, चलो, अब फौज में भर्ती हो लो!

भारत-भूमि का भी तो कुछ काम करने के लिए।

ख़ां साहब और राय बहादुर की पदवी लेकर,

जी-हुजूरी और गुलामी ही है करने के लिए।

ईश्वर से प्रार्थना करता है यही आज ‘वहीद’,

शक्ति मिल जाए हमें देश पे मरने के लिए।

आग की भीख 

धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,

कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।

कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;

मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?

दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,

बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।

प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।

चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,

कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?

मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा?

यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?

आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,

भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।

तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।

ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,

बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,

अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,

है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है।

निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है।

निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।

पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।

जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं,

अरमान-आरज़ू की लाशें निकल रही हैं।

भीगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं,

सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं।

इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,

पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।

उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।

विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।

आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,

मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे;

फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे,

हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।

आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे,

अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।

विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।

बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,

जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।

गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे।

इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।

हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,

अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।

प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,

तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।

 ~ रामधारी सिंह “दिनकर”

आज जीत की रात

आज जीत की रात

पहरुए! सावधान रहना

खुले देश के द्वार

अचल दीपक समान रहना

प्रथम चरण है नये स्वर्ग का

है मंज़िल का छोर

इस जन-मंथन से उठ आई

पहली रत्न-हिलोर

अभी शेष है पूरी होना

जीवन-मुक्ता-डोर

क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की

विगत साँवली कोर

ले युग की पतवार

बने अंबुधि समान रहना।

विषम शृंखलाएँ टूटी हैं

खुली समस्त दिशाएँ

आज प्रभंजन बनकर चलतीं

युग-बंदिनी हवाएँ

प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं

यह सिमटी सीमाएँ

आज पुराने सिंहासन की

टूट रही प्रतिमाएँ

उठता है तूफान, इंदु! तुम

दीप्तिमान रहना।

ऊंची हुई मशाल हमारी

आगे कठिन डगर है

शत्रु हट गया, लेकिन उसकी

छायाओं का डर है

शोषण से है मृत समाज

कमज़ोर हमारा घर है

किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी

यह विश्वास अमर है

जन-गंगा में ज्वार,

लहर तुम प्रवहमान रहना

पहरुए! सावधान रहना।।

~ गिरिजाकुमार माथुर

आज़ादों का गीत

हम ऐसे आज़ाद, हमारा

झंडा है बादल!

चांदी, सोने, हीरे, मोती

से सजतीं गुड़ियाँ,

इनसे आतंकित करने की बीत गई घड़ियाँ,

इनसे सज-धज बैठा करते

जो, हैं कठपुतले।

हमने तोड़ अभी फैंकी हैं

बेड़ी-हथकड़ियाँ;

परम्परा पुरखों की हमने

जाग्रत की फिर से,

उठा शीश पर हमने रक्खा

हिम किरीट उज्जवल!

हम ऐसे आज़ाद, हमारा

झंडा है बादल!

हरिवंशराय बच्चन

यारा प्यारा मेरा देश

यारा प्यारा मेरा देश,

सजा – संवारा मेरा देश॥

दुनिया जिस पर गर्व करे,

नयन सितारा मेरा देश॥

चांदी – सोना मेरा देश,

सफ़ल सलोना मेरा देश॥

सुख का कोना मेरा देश,

फूलों वाला मेरा देश॥

झुलों वाला मेरा देश,

गंगा यमुना की माला का मेरा देश॥

फूलोँ वाला मेरा देश

आगे जाए मेरा देश॥

नित नए मुस्काएं मेरा देश

इतिहासों में नाम लिखायें मेरा देश॥

हमारी शान है ये तिरंगा

हमारी शान है ये तिरंगा

ये विश्व भर में भारती की ये अमिट पहचान है।

ये तिरंगा हाथ में ले पग निरंतर ही बढ़े

ये तिरंगा हाथ में ले दुश्मनों से हम लड़े

ये तिरंगा दिल की धड़कन ये हमारी जान है

ये तिरंगा विश्व जन को सत्य का संदेश है

ये तिरंगा कह रहा है अमर भारत देश है

ये तिरंगा इस धरा पर शांति का संधान है

ये तिरंगा विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है

ये तिरंगा वीरता का गूँजता इक मंत्र है

ये तिरंगा वंदना है भारती का मान है

इसके रेषों में बुना बलिदानियों का नाम है

ये बनारस की सुबह है, ये अवध की शाम है

ये तिरंगा ही हमारे भाग्य का भगवान है

ये कभी मंदिर कभी ये गुरुओं का द्वारा लगे

चर्च का गुंबद कभी मस्जिद का मिनारा लगे

ये तिरंगा धर्म की हर राह का सम्मान है

ये तिरंगा स्वर्ग से सुंदर धरा कश्मीर है

ये तिरंगा झूमता कन्याकुमारी नीर है

ये तिरंगा माँ के होठों की मधुर मुस्कान है

ये तिरंगा बाईबल है भागवत का श्लोक है

ये तिरंगा आयत-ए-कुरआन का आलोक है

ये तिरंगा वेद की पावन ऋचा का ज्ञान है

ये तिरंगा देव नदियों का त्रिवेणी रूप है

ये तिरंगा सूर्य की पहली किरण की धूप है

ये तिरंगा भव्य हिमगिरि का अमर वरदान है

शीत की ठंडी हवा, ये ग्रीष्म का अंगार है

सावनी मौसम में मेघों का छलकता प्यार है

झंझावातों में लहरता ये गुणों की खान है

ये तिरंगा लता की इक कुहुकती आवाज़ है

ये रवि शंकर के हाथों में थिरकता साज़ है

टैगोर के जनगीत जन गण मन का ये गुणगान है

ये तिंरगा गांधी जी की शांति वाली खोज है

ये तिरंगा नेता जी के दिल से निकला ओज है

ये विवेकानंद जी का जगजयी अभियान है

रंग होली के हैं इसमें ईद जैसा प्यार है

चमक क्रिसमस की लिए यह दीप-सा त्यौहार है

ये तिरंगा कह रहा- ये संस्कृति महान है

ये तिरंगा अंदमानी काला पानी जेल है

ये तिरंगा शांति औ’ क्रांति का अनुपम मेल है

वीर सावरकर का ये इक साधना संगान है

ये तिरंगा शहीदों का जलियाँवाला बाग़ है

ये तिरंगा क्रांति वाली पुण्य पावन आग है

क्रांतिकारी चंद्रशेखर का ये स्वाभिमान है

रंग केसरिया बताता वीरता ही कर्म है

श्वेत रंग यह कह रहा है, शांति ही धर्म है

हरे रंग के स्नेह से ये मिट्टी ही धनवान है

ऋषि दयानंद के ये सत्य का प्रकाश है

महाकवि तुलसी के पूज्य राम का विश्वास है

ये तिरंगा वीर अर्जुन और ये हनुमान है

~ राजेश चेतन

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Final thought 

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