13+ Mothers Day Poem In Hindi | मदर डे पर कविता

इस पोस्ट में हम आपके साथ Hindi Poem On Mothers Day शेयर करने जा रहे है इन कविताओं को आप स्कूल में, समारोह में या इनसे सिख लेकर आप खुद से माँ पर नई कविता लिख सकते हो। 

13+ मदर डे पर कविताएं आपको इस पोस्ट में जानने को मिलेगी जिसे अच्छे प्रसिद्ध लेखकों द्वारा लिया गया है एवं उसे पब्लिश किया गया है जिसे हम एक जगह एकत्रित करके आपके साथ शेयर  है। 

Mothers Day Poem In Hindi

Mothers Day Poem In Hindi

इस दुनिया में हमें सबसे ज्यादा प्रेम माँ से होता है उसके बाद ही किसी अन्य से और माँ से ज्यादा प्रेम हमसे इस संसार में कोई नहीं कर सकता क्युकी माँ का प्रेम निस्वार्थ होता है। 

आपको इन कविताओं को जरूर पढ़ना चाहिए इससे आपको सिखने को मिलेगा और आप इन कविताओं को कहि सुना भी सकते हो और साथ में किसी प्रोजेक्ट में भी इस्तेमाल कर सकते हो, तो चलिए जानते है इन कविताओं को। 

Hindi Kavita on Maa

ये सभी कविताये हमने इंटरनेट पर से एवं सोशल साइट से कलेक्ट की है ये हमारे द्वारा लिखी गयी नहीं है इन कविताओं को कवियों के द्वारा लिखा गया है इसलिए मै आभारी हु उन सभी कवियों के लिए जिन्होंने बेहतरीन कविताओं को लिखा है।

प्यारी प्यारी मेरी माँ

प्यारी प्यारी मेरी माँ

प्यारी-प्यारी मेरी माँ

सारे जग से न्यारी माँ.

लोरी रोज सुनाती है,

थपकी दे सुलाती है.

जब उतरे आँगन में धूप,

प्यार से मुझे जगाती है.

देती चीज़ें सारी माँ,

प्यारी प्यारी मेरी माँ.

उंगली पकड़ चलाती है,

सुबह-शाम घुमाती है.

ममता भरे हुए हाथों से,

खाना रोज खिलाती है.

देवी जैसी मेरी माँ,

सारे जग से न्यारी माँ….

चुपके चुपके मन ही मन में

चुपके चुपके मन ही मन में

खुद को रोते देख रहा हूँ

बेबस होके अपनी माँ को

बूढ़ा होता देख रहा हूँ

रचा है बचपन की आँखों में

खिला खिला सा माँ का रूप

जैसे जाड़े के मौसम में

नरम गरम मखमल सी धूप

धीरे धीरे सपनों के इस

रूप को खोते देख रहा हूँ

बेबस होके अपनी माँ को

बूढ़ा होता देख रहा हूँ………

छूट छूट गया है धीरे धीरे

माँ के हाथ का खाना भी

छीन लिया है वक्त ने उसकी

बातों भरा खजाना भी

घर की मालकिन को

घर के कोने में सोते देख रहा हूँ

चुपके चुपके मन ही मन में

खुद को रोते देख रहा हूँ………

बेबस होकर अपनी माँ को

बूढ़ा होता देख रहा हूँ…..

क्या सीरत क्या सूरत थी

क्या सीरत क्या सूरत थी

माँ ममता की मूरत थी

पाँव छुए और काम बने

अम्मा एक महूरत थी

बस्ती भर के दुख सुख में

एक अहम ज़रूरत थी

सच कहते हैं माँ हमको

तेरी बहुत जरूरत थी

~ मंगल नसीम

है माँ…..

हमारे हर मर्ज की दवा होती है माँ….

कभी डाँटती है हमें, तो कभी गले लगा लेती है माँ…..

हमारी आँखोँ के आंसू, अपनी आँखोँ मेँ समा लेती है माँ…..

अपने होठोँ की हँसी, हम पर लुटा देती है माँ……

हमारी खुशियों मेँ शामिल होकर, अपने गम भुला देती है माँ….

जब भी कभी ठोकर लगे, तो हमें तुरंत याद आती है माँ…..

दुनिया की तपिश में, हमें आँचल की शीतल छाया देती है माँ…..

खुद चाहे कितनी थकी हो, हमें देखकर अपनी थकान भूल जाती है माँ….

प्यार भरे हाथों से, हमेशा हमारी थकान मिटाती है माँ…..

बात जब भी हो लजीज खाने की, तो हमें याद आती है माँ……

रिश्तों को खूबसूरती से निभाना सिखाती है माँ…….

लब्जोँ मेँ जिसे बयाँ नहीँ किया जा सके ऐसी होती है माँ…….

भगवान भी जिसकी ममता के आगे झुक जाते हैँ

~ कुसुम

माँ अगर तुम न होती

माँ अगर तुम न होती तो

माँ अगर तुम न होती तो मुझे समझाता कौन…

काँटो भरी इस मुश्किल राह पर चलना सिखाता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मुझे लोरी सुनाता कौन…

खुद जागकर सारी रात चैन की नींद सुलाता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मुझे चलना सिखलाता कौन…

ठोकर लगने पर रस्ते पर हाथ पकड़ कर संभालता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मुझे बोलना सिखाता कौन…

बचपन के अ, आ, ई, पढ़ना-लिखना सिखाता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मुझे हँसना सिखाता कौन…

गलती करने पर पापा की डाँट से बचाता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मुझे परिवार का प्यार दिलाता कौन…

सब रिश्ते और नातों से मेरी मुलाकात कराता कौन….

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मुझे गलती करने से रोकता कौन…

सही क्या हैं, गलत क्या हैं इसका फर्क बताता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मुझे ‘प्यारी लाड़ो’ कहता कौन…

‘मेरी राज-दुलारी प्यारी बिटिया’ कहकर गले लगाता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मुझे समाज मैं रहना सिखाता कौन…

तुम्हारे बिना ओ मेरी माँ मेरा अस्तित्व स्वीकारता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

माँ अगर तुम न होती तो मेरा हौसला बढ़ाता कौन…

नारी की तीनों शक्ति से मुझे परिचित कराता कौन…

माँ अगर तुम न होती तो…

                           ~ वन्दना शर्मा

जिंदगी की कड़ी धूप मे

जिंदगी की कड़ी धूप मे छाया मुझ पर कि

खड़ी रहती है सदा माँ मेरे लिये

माँ के आँचल मे आकर हर दुख भूल जाँऊ

हाथ रखे जो सर पे चैन से मै सो जाऊँ

वो जाने मुझे मुझसे ज्यादा, वो चाहे मुझे सबसे ज्यादा

मेरी हर खुशी को मुझे देने के लिये

खड़ी रहती है सदा माँ मेरे लिये

हर चोट का माँ है इकलौता मरहम

गोद मे उसकी सर रख के मिट जाए सारे गम

जिंदगी की हर घड़ी मे साथ उसका है जरूरी

माँ के साथ बिना हर खुशी है अधूरी

इस दुनिया के कांटों को फूल बनाये हुए

खड़ी रहती है सदा माँ मेरे लिये।

~ कृतिका शर्मा 

माँ भगवान का दूसरा रूप

माँ भगवान का दूसरा रूप

उनके लिए दे देंगे जान

हमको मिलता जीवन उनसे

कदमो में है स्वर्ग बसा

संस्कार वह हमे बतलाती

अच्छा बुरा हमे बतलाती

हमारी गलतियों को सुधारती

प्यार वह हमपर बरसती.

तबीयत अगर हो जाए खराब

रात-रात भर जागते रहना

माँ बिन जीवन है अधूरा

खाली-खाली सुना-सुना

खाना पहले हमे खिलाती

बाद में वह खुद खाती

हमारी ख़ुशी में खुश हो जाती

दुःख में हमारी आँसू बहाती

कितने खुशनसीब है हम

पास हमारे है माँ

होते बदनसीब वो कितने

जिनके पास ना होती माँ….

मेरी माँ है वो

मेरी माँ है वो जो मुझे हसाती-दुलारती,

त्याग और मेहनत से मेरे जीवन को संवारती।

चाहे वह खुद सो जाये भूखे पेट,

लेकिन मुझे खिलाती है भरपेट।

उसकी ममता की नही है कोई सीमा,

उनसे सीखा है मैंने यह जीवन जीना।

मेरा सुख ही उसका सुख है,

मेरा दुख ही उसका दुख है।

रहती है उसे सदा मेरे तरक्की की अभिलाषा,

अब मैं भला क्या बताउ माँ की परिभाषा।

मेरे जीवन के संकट रुपी धूप से वह टकराती है,

मेरे संकट परेशानियों में वह मातृ छाया बन जाती है।

वह है मेरे हर चिंता को दूर करने वाली,

वाकई में मेरे लिये मेरी माँ है सबसे निराली।

~ योगेश कुमार सिंह 

लब्बो पर उसके कभी बद्दुआ…

लब्बो पर उसके कभी बद्दुआ नहीं होती

बस एक माँ है जो कभी खफा नहीं होती

इस तरह वो मेरे गुनाहों को धो देती है

माँ बहुत गुस्से में होती है तो बस रो देती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसु

मुदतो माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

अभी जिन्दा है मेरी माँ मुझे कुछ नहीं होगा

मै जब घर से निकलता हूँ तो दुआ भी साथ चलती है मेरे

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है

माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

ए अँधेरे देख ले तेरा मुंह काला हो गया

माँ ने आँखें खोल दी और घर में उजाला हो गया

मेरी खुआइश है की मै फिर से फ़रिश्ता हो जाऊ

माँ से इस तरह लिपटूँ की फिर से बच्चा हो जाऊ

अपने आंचल की छाँव में

अपने आंचल की छाँव में,

छिपा लेती है हर दुख से वोह

एक दुआ दे दे तो

काम सारे पूरे हों…

अदृश्य है भगवान,

ऐसा कहते है जो…

कहीं ना कहीं एक सत्य से,

अपरिचित होते है वोह…

खुद रोकर भी हमें

हंसाती है वोह…

हर सलीका हमें

सिखलाती है वोह…

परेशानी हो चाहे जितनी भी,

हमारे लिए मुस्कुराती है वोह…

हमारी खुशियों की खातिर

दुखों को भी गले लगाती है वो…

हम निभाएं ना निभाएं

अपना हर फ़र्ज़ निभाती है वोह…

हमने देखा जो सपना

सच उसे बनती है वो…

दुःख के बादल जो छाये हम पर

तो धुप सी खिले जाती है वोह…

ज़िन्दगी की हर रेस में

हमारा होसला बढाती है वोह…

हमारी आँखों से पढ़ लेती है

तकलीफ और उसे मिटाती है वोह…

पर अपनी तकलीफ कभी नही जताती है वोह…

शायद तभी भगवान से भी ऊपर आती है वोह…

तब भी त्याग की मूरत नही माँ कहलाती है ‘वोह’….

ममता की सुधियाँ

ममता की सुधियाँ

जब कभी शाम के साये मंडराते हैं

मैं दिवाकिरण की आहट को रोक लेती हूँ

और सायास एक बार

उस तुलसी को पूजती हूँ

जिसे रोका था मेरी माँ ने

नैनीताल जाने से पहले

जब हम इसी आंगन में लौटे थे

तब मैं उस माँ की याद में रो भी न सकी थी

वह माँ जिसके सुमधुर गान फिर कभी सुन न सकी थी

वह माँ जो उसी आँगन में बैठ कर मुझे अल्पना उकेरना सिखा न सकी थी

वह माँ जिसके बनाये व्यंजनों में मेरा भाग केवल नमकीन था

वह माँ जिसके वस्त्रों में सहेजा गया ममत्व

मेरी विरासत न बन

एक परंपरा बन गया था

वह माँ जिसके पुनर्वास के लिए

हमने सहेजे थे कंदील और

हम बैठे थे टिमटिमाते दीपों की छाया में

और बैठे ही रहे थे

~ सोहिनी

याद तुम्हारी आई

याद तुम्हारी आई

हाँ माँ याद तुम्हारी आई, कंठ रूँधा आँखें भर आई

फिर स्मृति के घेरों में तुम मुझे बुलाने आई

मैं अबोध बालक-सा सिसका सुधि बदरी बरसाई

बालेपन की कथा कहानी पुनः स्मरण आई

त्याग तपस्या तिरस्कार सब सहन किया माँ तुमने

कर्म पथिक बन कर माँ तुमने अपनी लाज निभाई

तुमसे ही तो मिला है जो कुछ उसको बाँट रहा हूँ

तुम उदार मन की माता थीं तुमसे जीवन की निधि पाई

नहीं सिखाया कभी किसी को दुःख पहुँचाना

नहीं सिखाया लोभ कि जिसका अन्त बड़ा दुखदाई

स्वच्छ सरल जीवन की माँ तुमसे ही मिली है शिक्षा

नहीं चाहिए जग के कंचन ‘औ झूठी प्रभुताई

मुझे तेरा आशीष चाहिए और नहीं कुछ माँगू

सदा दुखी मन को बहला कर हर लूँ पीर पराई

यदि मैं ऐसा कर पाऊँ तो जीवन सफल बनाऊँ

तेरे चरणो में नत हो माँ तेरी ही महिमा गाई

~ भगवत शरण श्रीवास्तव ‘शरण’

घुटनों से रेंगते रेंगते

घुटनों से रेंगते रेंगते

कब पैरो पर खड़ा हुआ

तेरी ममता की छांव में

ना जाने कब बड़ा हुआ

काला टीका दूध मलाई

आज भी सब कुछ वैसा हैं

एक मैं ही मैं हूँ हर जगह

प्यार ये तेरा कैसा हैं

सीदा-सादा , भोला-भाला

मैं ही सबसे अच्छा हूँ

कितना भी हो जाऊं बड़ा माँ

मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ

कैसा था नन्हा बचपन वो

माँ की गोद सुहानी थी ,

देख देख कर बच्चों को वो

फूली नहीं समाती थी।

ज़रा सी ठोकर लग जाती तो

माँ दौड़ी हुई आती थी ,

ज़ख्मों पर जब दवा लगाती

आंसू अपने छुपाती थी।

जब भी कोई ज़िद करते तो

प्यार से वो समझाती थी,

जब जब बच्चे रूठे उससे

माँ उन्हें मनाती थी।

खेल खेलते जब भी कोई

वो भी बच्चा बन जाती थी,

सवाल अगर कोई न आता

टीचर बन के पढ़ाती थी।

सबसे आगे रहें हमेशा

आस सदा ही लगाती थी ,

तारीफ़ अगर कोई भी करता

गर्व से वो इतराती थी।

होते अगर ज़रा उदास हम

दोस्त तुरंत बन जाती थी ,

हँसते रोते बीता बचपन

माँ ही तो बस साथी थी।

माँ के मन को समझ न पाये

हम बच्चों की नादानी थी ,

जीती थी बच्चों की खातिर

माँ की यही कहानी थी।

Miss You Maa

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Final Thought 

इस पोस्ट में हमने आपके साथ Mothers Day Poem In Hindi [ मदर डे पर कविताएं ] शेयर की जिसे आपने इस पोस्ट में पढ़ा होगा, मुझे उम्मीद है कि यह पोस्ट आपको जरूर पसंद आयी होगी। 

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